उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main jaanta hun agar maut darmiyan na ho

मैं जानता हूँ अगर मौत दरमियान न हो

میں جانتا ہوں اگر موت درمیان نہ ہو

शायर: Jabbar Wasif8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं जानता हूँ अगर मौत दरमियान न हो
ख़ुदा के नाम की का'बे में भी अज़ान न हो

अगर यक़ीं हो कि अब बे-निशाँ नहीं होना
किसी जबीं पे किसी फ़र्ज़ का निशान न हो

बराए-आदमी क़ाएम है दफ़्तर-ए-अफ़्लाक
जो वो न हो तो सितारों का ख़ानदान न हो

है आसमान फ़रिश्तों की सरज़मीन अगर
तो फिर ज़मीन कहीं उन का आसमान न हो

उसी की ज़ात पे खुलती है ज़ात सूरज की
कि जिस का धूप के महशर में साएबान न हो

महल बहिश्त में होने का क्या ये मतलब है
कि मेरे शहर में मेरा कोई मकान न हो

ख़ुदा के मुनकिरो बतलाओ क्या ये मुमकिन है
कि सुर्ख़ ऊँट हों और उन का सारबान न हो

ये सोच कर हैं परेशान क़िस्सा-गो 'वासिफ़'
जो दास्तान है आदम की दास्तान न हो