उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mahfil mein jaane kaise sar-e-am aa gaya

महफ़िल में जाने कैसे सर-ए-आम आ गया

محفل میں جانے کیسے سر عام آ گیا

शायर: B.M Khan Maley7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

महफ़िल में जाने कैसे सर-ए-आम आ गया
आख़िर ज़बाँ पे उस के मिरा नाम आ गया

मैं ने छुपा के रक्खा था जो दिल में राज़-ए-इश्क़
ख़त में क़ुबूल लिख के वो पैग़ाम आ गया

कैसे कहूँ फ़लक मैं तुझे कितना ख़ुश हूँ आज
ये देख ले दुआओं का इनआ'म आ गया

साक़ी से आँखों आँखों में ख़ाली इशारतन
कहने की देर थी कि भरा जाम आ गया

क़ातिल का पर्दा फ़ाश किया जबकि मैं ने ख़ुद
मुझ पर ही हैफ़ क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया

अब कुछ न होगा जाग के ग़फ़लत की नींद से
सूरज ग़ुरूब होने लब-ए-बाम आ गया

सय्याद के बग़ैर 'म'आले' न रह सका
घर लौट कर परिंदा सर-ए-शाम आ गया