उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mahfil mein ghair hi ko na har bar dekhna

महफ़िल में ग़ैर ही को न हर बार देखना

محفل میں غیر ہی کو نہ ہر بار دیکھنا

शायर: Parveen Umm-e-Mushtaq11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

महफ़िल में ग़ैर ही को न हर बार देखना
मेरी तरफ़ भी भूल के सरकार देखना

आग़ाज़-ए-सब्ज़ा से है जो रुख़्सार पर ग़ुबार
अगले बरस इसे ख़त-ए-गुलज़ार देखना

जब सर्फ़-ए-गुफ़्तुगू हूँ तो देखे उन्हें कोई
मंज़ूर हो जो अब्र-ए-गुहर-बार देखना

मैं ने कहा कि हिज्र में कुछ मश्ग़ला नहीं
बोले कि रात दिन दर-ओ-दीवार देखना

कहता हूँ जब मैं उन से बनाव-सिंघार को
कहते हैं कोई और तरहदार देखना

मैं जान भी दरेग़ करूँ तो गुनाहगार
मेरे सिवा न और ख़रीदार देखना

वो मुझ से पूछते हैं कि कुछ ऐब तो नहीं
रफ़्तार देखना मिरी गुफ़्तार देखना

शैख़-ए-ज़माँ क़दीम रविश के बुज़ुर्ग हैं
कितना बड़ा है गुम्बद-ए-दस्तार देखना

वो बार बार देखते हैं आइने में मुँह
अल्लाह उन का रू-ए-पुर-अनवार देखना

चलते हैं कू-ए-यार में है वक़्त-ए-इम्तिहाँ
हिम्मत न हारना दिल-ए-बीमार देखना

होशियार फूँक फूँक के रखना यहाँ क़दम
'परवीं' ज़रा ज़माने की रफ़्तार देखना