उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mazi ke gulsitan mein jab le chalengi aankhen

माज़ी के गुलसिताँ में जब ले चलेंगी आँखें

ماضی کے گلستاں میں جب لے چلیں گی آنکھیں

शायर: Madhu Madhuman8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

माज़ी के गुलसिताँ में जब ले चलेंगी आँखें
लम्हों की ख़ुशबुओं से महका करेंगी आँखें

यादों के अब्र जब भी छाएँगे ज़ेहन-ओ-दिल पर
बे-साख़्ता झमाझम बहने लगेंगी आँखें

अल्फ़ाज़ जब न होंगे होंटों पे होंगे ताले
ऐसे में दिल की सारी बातें कहेंगी आँखें

मा'लूम है कि उस ने आना नहीं है वापस
हर-वक़्त फिर भी उस का रस्ता तकेंगी आँखें

कितने भी हों समुंदर अश्कों के उन में चाहे
दुनिया के सामने पर हँसती रहेंगी आँखें

दीवार ताकते ही गुज़रेगी रात शायद
नींदें ही रूठ जाएँ तो क्या करेंगी आँखें

ज़िद्दी हैं इस क़दर ये सुनती नहीं है कहना
बोझल हों चाहे पलकें फिर भी जगेंगी आँखें

मजबूर हैं ये शायद फ़ितरत से अपनी 'मधुमन'
मायूसियों में भी कुछ सपने बुनेंगी आँखें