उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum pe kuchh yun hai zindagi ka qarz

हम पे कुछ यूँ है ज़िंदगी का क़र्ज़

ہم پہ کچھ یوں ہے زندگی کا قرض

शायर: Madhu Madhuman7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम पे कुछ यूँ है ज़िंदगी का क़र्ज़
जैसे लम्हे पे हो सदी का क़र्ज़

वक़्त महदूद और साँसें कम
कैसे चुकता करें सभी का क़र्ज़

ये जो हैं वुस'अतें समंदर की
उस के सर पर है हर नदी का क़र्ज़

दो गुना कर के सब को लौटाया
हम ने रक्खा नहीं किसी का क़र्ज़

आँसुओं से अदा किया हम ने
एक छोटी सी भी ख़ुशी का क़र्ज़

दौर-ए-नौ के सुख़नवरों पर है
'मीर'-ओ-'ग़ालिब' की शा'इरी का क़र्ज़

चाह कर भी नहीं उतर सकता
हम पे 'मधुमन' जो है नबी का क़र्ज़