उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bazm-e-farhat ras aai hi nahin

बज़्म-ए-फ़रहत रास आई ही नहीं

بزم فرحت راس آئی ہی نہیں

शायर: Madhu Madhuman8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बज़्म-ए-फ़रहत रास आई ही नहीं
जग से निस्बत रास आई ही नहीं

हम निभाना चाहते तो थे मगर
रस्म-ए-उल्फ़त रास आई ही नहीं

शौक़ से हम भी मनाते जश्न पर
कोई सा'अत रास आई ही नहीं

हम ने तो क़ुर्बान कर दी जान तक
उन को शफ़क़त रास आई ही नहीं

चल पड़ी दुनिया बदी की राह पर
इस को जौदत रास आई ही नहीं

फूल हम ने भी खिलाए थे मगर
हम को निकहत रास आई ही नहीं

ऐसी क़िस्मत थी कि हम को ज़िंदगी
ता-क़यामत रास आई ही नहीं

आख़िरश ख़ल्वत में 'मधुमन' रम गए
हम को जल्वत रास आई ही नहीं