उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mathe pe paDi zulf-e-girah-gir hila di

माथे पे पड़ी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर हिला दी

ماتھے پہ پڑی زلف گرہ گیر ہلا دی

शायर: R P Shokh5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

माथे पे पड़ी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर हिला दी
क्यूँ तुम ने दिल-ए-ख़ुफ़्ता की ज़ंजीर हिला दी

वैसे तो मिरे इश्क़ का हर नक़्श हसीं था
जब दर्द ने खींची तो ये तस्वीर हिला दी

ख़त भेज दिया काट के पैमान-ए-मुलाक़ात
ये कौन है जिस ने तिरी तहरीर हिला दी

यूँ ही न समझ अहल-ए-मोहब्बत के जुनूँ को
कम-बख़्त ने जब चाहा है तक़दीर हिला दी

वो ज़लज़ला गो रोज़ हिला देता था दिल को
इस बार मगर सारी ही ता'मीर हिला दी