उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lutf ab aae na kyon anjuman-arai ka

लुत्फ़ अब आए न क्यों अंजुमन-आराई का

لطف اب آئے نہ کیوں انجمن آرائی کا

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लुत्फ़ अब आए न क्यों अंजुमन-आराई का
ज़र्रे ज़र्रे में है जल्वा तिरी यकताई का

देखने से तन-ए-रंजूर में जान आती है
ज़िंदगी नाम है ऐ जाँ तिरी ज़ेबाई का

तेरे जल्वे ने किया दोनों जहाँ को रौशन
हौसला बढ़ने लगा चश्म-ए-तमाशाई का

इश्क़ ने ज़ुल्फ़ों के मशहूर किया सौदाई
बोल-बाला है जहाँ में मिरी रुस्वाई का

चश्मक-ए-बर्क़-ए-फ़ुसूँ-गर है कि ये हुस्न-ए-अज़ल
बाग़-ए-आलम में है चर्चा तिरी रानाई का

मुनहसिर दैर पे काबा पे नहीं कुछ दीदार
हौसला चाहिए है चश्म-ए-तमाशाई का

चश्म-ए-बद-दूर तिरा हुस्न भी है एक ए'जाज़
कि मुकद्दर है यहाँ आइना बीनाई का

ले ज़रा इस की ख़बर बहर-ए-ख़ुदा ऐ ज़ालिम
इन दिनों हाल बुरा है तिरे शैदाई का

बंदगी हो गई मक़्बूल मिली दिल की मुराद
मिल गया 'शाद' सिला तुझ को जबीं-साई का