उर्दू शायरी · ग़ज़ल

log kyun humse shikayat ki tawaqqo rakhen

लोग क्यूँ हम से शिकायत की तवक़्क़ो' रखें

لوگ کیوں ہم سے شکایت کی توقع رکھیں

शायर: Jaleel Hashmi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लोग क्यूँ हम से शिकायत की तवक़्क़ो' रखें
हैं ख़ुद-आज़ार भी इतने कि सितमगर रोएँ

अब तो आती हैं कुछ इस तरह तुम्हारी यादें
धूप में जैसे किसी चेहरे से बादल गुज़रें

मातम-ए-ग़ुंचा में रोए हैं नदामत है बहुत
शिद्दत-ए-ग़म में रहा पास-ए-तबस्सुम न हमें

अब ग़म-ए-दिल का सफ़ीना है कि दरिया माँगे
और ये रोना है कि आँसू भी नहीं आँखों में

हम से लिपटी हुई तलवार हो जैसे यारो
इक नया ज़ख़्म सुलगता है जो करवट बदलें

तुझ को देखा जो न होता तो ख़ुदा कह लेते
ये भी मुश्किल नज़र आता है कि पत्थर पूजें

वो करम है तिरा साँसों में सुनाई देना
ये सितम है कि तुझे ढूँढ रही हैं आँखें

'हशमी' जिस्म नज़र आता है सूली की तरह
जब मसीहा के लिए प्यार से बाज़ू खोलीं