उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dekhna rasm-e-mohabbat ka ada ho jaana

देखना रस्म-ए-मोहब्बत का अदा हो जाना

دیکھنا رسم محبت کا ادا ہو جانا

शायर: Jaleel Hashmi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

देखना रस्म-ए-मोहब्बत का अदा हो जाना
मेरी आग़ोश का सूली पे भी वा हो जाना

कभी कैसे नज़र आना कभी क्या हो जाना
बावर आया हमें इंसाँ का ख़ुदा हो जाना

इस से पहले कभी शायद कि ये रुत आई हो
क़द में सब्ज़े का दरख़्तों से बड़ा हो जाना

ज़िंदगी तेरे मक़ामात कड़े हैं कितने
अपने दरवाज़े पे भी आ के गदा हो जाना

उस ने पामाल किया है तो शिकायत कैसी
मुझ को मा'लूम है मिट्टी का हरा हो जाना

मुद्दतों बा'द तो आए हो कोई बात करो
मान लो फिर किसी फ़ुर्सत में ख़फ़ा हो जाना

पेड़ के साए में बैठा हूँ मगर जानता हूँ
शाख़ से टूट के पत्ते का जुदा हो जाना

लोग कहते हैं कि राहों में जल उठते हैं दिए
तुम किसी शाम इधर से भी ज़रा हो जाना

दश्त-ए-ग़ुर्बत ही पे मौक़ूफ़ नहीं अब 'हशमी'
अपनी गलियों में फिरो आबला-पा हो जाना