उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahi na un se jo honTon pe baat aai bhi

कही न उन से जो होंटों पे बात आई भी

کہی نہ ان سے جو ہونٹوں پہ بات آئی بھی

शायर: Jaleel Hashmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कही न उन से जो होंटों पे बात आई भी
कि आश्नाई भी थी शर्म-ए-आश्नाई भी

कोई तलब थी तो दस्त-ए-सवाल फैलाते
मगर मिली थी कहाँ सूरत-ए-गदाई भी

कहो हवा से चले आज रात थम थम कर
कि आग है मिरे दामन में कुछ पराई भी

तिरे करम के फ़साने तो शहर भर से कहे
तिरे सितम की कहाँ जा के दें दहाई भी

तिरी सदा पे गुमाँ धड़कनों का होता था
'अजब था अब के सुकूत-ए-शब-ए-जुदाई भी

तुम्हारी हम-सफ़री के भी थे बहुत एहसाँ
हुई है वज्ह-ए-नदामत शिकस्ता-पाई भी

नज़र बुझी तो मिले रौशनी कहाँ 'हशमी'
जला के शम' बहुत आँख से लगाई भी