उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lakiren khinch kar kya kya wo kaghaz par banata hai

लकीरें खींच कर क्या क्या वो काग़ज़ पर बनाता है

لکیریں کھینچ کر کیا کیا وہ کاغذ پر بناتا ہے

शायर: Naeem Faraz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लकीरें खींच कर क्या क्या वो काग़ज़ पर बनाता है
तिरा दिवाना तेरे हुस्न का पैकर बनाता है

बदलते वक़्त ने उस का हसीं पेशा बदल डाला
जो कल फूलों का ताजिर था वो अब ख़ंजर बनाता है

बिना गहनों के रुख़्सत हो गई लख़्त-ए-जिगर उस की
अमीरों के लिए जो क़ीमती ज़ेवर बनाता है

चलो उस शख़्स की हिम्मत की हम भी दाद ही दे लें
समुंदर के किनारे रेत का जो घर बनाता है

जुनूँ की कौन सी मंज़िल पे आ पहुँचा है दीवाना
जो सूरज के मुक़ाबिल मोम का लश्कर बनाता है

'फ़राज़' उस के क़दम लेने कभी मंज़िल नहीं आती
सफ़र के सिर्फ़ मंसूबे ही जो अक्सर बनाता है