उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bewa man ko KHun ke aansu rulate hain charagh

बेवा माँ को ख़ून के आँसू रुलाते हैं चराग़

بیوہ ماں کو خون کے آنسو رلاتے ہیں چراغ

शायर: Naeem Faraz8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बेवा माँ को ख़ून के आँसू रुलाते हैं चराग़
छोड़ कर बस्ता किताबें जब कमाते हैं चराग़

सोने चाँदी ताँबे पीतल से बनाना फ़न नहीं
अहल-ए-फ़न हैं जो कि मिट्टी से बनाते हैं चराग़

आज भी मेरे वतन के छोटे छोटे गाँव में
शाम होते ही बड़े बूढ़े लगाते हैं चराग़

कश्तियाँ रस्ते से हट जाएँ न तूफ़ाँ के सबब
हम अँधेरों में लब-ए-साहिल जलाते हैं चराग़

देवता भी आरती का ख़ूब लेते हैं मज़ा
हुस्न वाले थालियों में जब सजाते हैं चराग़

बे-तहाशा जज़्बा-ए-उल्फ़त में लग जाती है आग
वो हिनाई दस्त-ए-नाज़ुक से जलाते हैं चराग़

तन के उजले मन के काले लोग ये करते हैं काम
ख़ुद नहीं रखते तो औरों के बुझाते हैं चराग़

वक़्त-ए-रुख़्सत अश्क-ए-लर्ज़ीदा से पलकों पे 'फ़राज़'
सुब्ह-दम तारों के जैसे झिलमिलाते हैं चराग़