उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek wo ki apni zid pe barabar aDe rahe

इक वो कि अपनी ज़िद पे बराबर अड़े रहे

اک وہ کہ اپنی ضد پہ برابر اڑے رہے

शायर: Naeem Faraz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक वो कि अपनी ज़िद पे बराबर अड़े रहे
इक हम कि इंतिज़ार में पहरों खड़े रहे

दरिया-ए-इश्क़ कर लिया होता उबूर मैं
लेकिन मिरे नसीब में कच्चे घड़े रहे

जितने थे कम-निगाह वो जलवों में खो गए
अहल-ए-नज़र की आँख पे पर्दे पड़े रहे

इक शोर जी हुज़ूरी का रहता था आस-पास
जब तक मिरे लिबास में हीरे जड़े रहे

हैरत कि जिन को ढूँडे है दरिया इधर उधर
दर पर मिरे 'फ़राज़' वो प्यासे खड़े रहे