उर्दू शायरी · ग़ज़ल

lab par machalte lafzon ko chakh kar na dekh le

लब पर मचलते लफ़्ज़ों को चख कर न देख ले

لب پر مچلتے لفظوں کو چکھ کر نہ دیکھ لے

शायर: Saba Ikram6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

लब पर मचलते लफ़्ज़ों को चख कर न देख ले
वो पेड़ नीम का मिरे अंदर न देख ले

दिल ख़्वाहिशों के कूचे में निकला तो है मगर
वो तिफ़्ल-ए-दर्द फिर कहीं पत्थर न देख ले

रस्ते कई बदल के मैं लौटा हूँ शहर से
डर था कि वो अज़ीज़ कहीं घर न देख ले

बरहम बहुत है आज वो हर एक शख़्स से
अपना ही आइने में वो पैकर न देख ले

बूँदें लहू की सूँघती बिल्ली वो दर्द की
दिल का लहूलुहान कबूतर न देख ले

हैं पौदा लाजवंती का ख़्वाबों की मूरतें
'इकराम' वक़्त हाथ लगा कर न देख ले