उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyunki hum duniya mein aae kuchh sabab khulta nahin

क्यूँकि हम दुनिया में आए कुछ सबब खुलता नहीं

کیونکہ ہم دنیا میں آئے کچھ سبب کھلتا نہیں

शायर: Bahadur Shah Zafar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यूँकि हम दुनिया में आए कुछ सबब खुलता नहीं
इक सबब क्या भेद वाँ का सब का सब खुलता नहीं

पूछता है हाल भी गर वो तो मारे शर्म के
ग़ुंचा-ए-तस्वीर के मानिंद लब खुलता नहीं

शाहिद-ए-मक़्सूद तक पहुँचेंगे क्यूँकर देखिए
बंद है बाब-ए-तमन्ना है ग़ज़ब खुलता नहीं

बंद है जिस ख़ाना-ए-ज़िंदाँ में दीवाना तेरा
उस का दरवाज़ा परी-रू रोज़ ओ शब खुलता नहीं

दिल है ये ग़ुंचा नहीं है इस का उक़्दा ऐ सबा
खोलने का जब तलक आवे न ढब खुलता नहीं

इश्क़ ने जिन को किया ख़ातिर-गिरफ़्ता उन का दिल
लाख होवे गरचे सामान-ए-तरब खुलता नहीं

किस तरह मालूम होवे उस के दिल का मुद्दआ
मुझ से बातों में 'ज़फ़र' वो ग़ुंचा-लब खुलता नहीं