उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyun tirgi si chhai charaghon ke darmiyan

क्यूँ तीरगी सी छाई चराग़ों के दरमियाँ

کیوں تیرگی سی چھائی چراغوں کے درمیاں

शायर: Pallavi Mishra10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यूँ तीरगी सी छाई चराग़ों के दरमियाँ
क्या हुस्न छुप गया है नक़ाबों के दरमियाँ

नासूर बन गया कई सालों के दरमियाँ
इक ज़ख़्म जाने कैसा है छालों के दरमियाँ

वो नींद में भी आँख से ओझल न हो जनाब
उस को बसा लिया है निगाहों के दरमियाँ

शिद्दत है प्यास में तो सरोवर के जा क़रीब
कब तिश्नगी मिटी है सराबों के दरमियाँ

औलाद पे अगर जो मुसीबत न होती आज
क्यूँ माँ का हाथ रुकता निवालों के दरमियाँ

यूँ ही जनाब हम को ये ओहदा नहीं नसीब
सालों है सर खपाया किताबों के दरमियाँ

जो ग़ौर से पढ़ोगे सवालों को बार बार
मिल जाएगा जवाब सवालों के दरमियाँ

साहिल को तोड़ने की हिमाक़त किए बग़ैर
लहरें उछल रही हैं किनारों के दरमियाँ

मिलता नहीं है कुछ भी तरद्दुद किए बग़ैर
काँटे भरे पड़े हैं गुलाबों के दरमियाँ

शायद मिरे सनम ने किया याद मुझ को आज
हिचकी तभी है आई निवालों के दरमियाँ