उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi sab chhin leta hun kabhi neamat luTata hun

कभी सब छीन लेता हूँ कभी ने'मत लुटाता हूँ

کبھی سب چھین لیتا ہوں کبھی نعمت لٹاتا ہوں

शायर: Pallavi Mishra7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी सब छीन लेता हूँ कभी ने'मत लुटाता हूँ
मुझे सब वक़्त कहते हैं मैं उँगली पर नचाता हूँ

न मैं का'बे में रहता हूँ न मैं काशी में रहता हूँ
गरेबाँ झाँक कर देखो मैं तेरे दिल में बस्ता हूँ

अकेला छोड़ कर मुझ को यकायक चल दिए सारे
सहारा जब ख़ुदा का है कहेगा कौन तन्हा हूँ

गरजती है घटा तो क्या है तूफ़ानी हवा तो क्या
जिगर में है बहुत हिम्मत किसी से मैं न डरता हूँ

बिछड़ जाऊँ अगर तुम से अंधेरा छा ही जाएगा
कि जिस में नूर है पिन्हा मैं ऐसा इक नगीना हूँ

क़सम खा कर मुकर जाना तिरी आदत पुरानी है
क़सम से जब क़सम खाऊँ मैं शिद्दत से निभाता हूँ

ये सूरज चाँद की यारी बड़ी अद्भुत पहेली है
कहें दोनों ही आपस में कि तुम आओ मैं जाता हूँ