उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyun ju-e-rawan aa ke yun aankhon mein khaDi hai

क्यूँ जू-ए-रवाँ आ के यूँ आँखों में खड़ी है

کیوں جوئے رواں آ کے یوں آنکھوں میں کھڑی ہے

शायर: R P Shokh8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यूँ जू-ए-रवाँ आ के यूँ आँखों में खड़ी है
लगता है पहाड़ों पे कहीं बर्फ़ पड़ी है

ऐ दर्द कभी उठ भी सही तंगी-ए-दिल से
मुद्दत से दर-ए-दिल पे कोई याद खड़ी है

मंज़िल को चले या किसी मक़्तल को चले हैं
हर राह यूँ लगती है कि ज़ंजीर पड़ी है

यूँही तो नहीं बैठ गए झाड़ के दामन
महरूमी-ए-तक़दीर से उम्मीद बड़ी है

दो दिन की मोहब्बत ने दी ये हस्ती-ए-जावेद
इक पल भी नहीं कटती अभी उम्र पड़ी है

यूँ हम ने निकाली है तिरी राह-ए-मुलाक़ात
यूँ हिज्र तिरे दीद की बरकत की घड़ी है

हर सुब्ह तिरी चश्म-ए-फ़ुसूँ-साज़ का ग़म्ज़ा
हर शाम तिरे लब से हँसी फूट पड़ी है

दिन है तो है महका तिरे रुख़्सार का ग़ाज़ा
शब है तो तिरी माँग सितारों से जड़ी है