उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kyon kahun main ki sitam ka main saza-war na tha

क्यों कहूँ मैं कि सितम का मैं सज़ा-वार न था

کیوں کہوں میں کہ ستم کا میں سزاوار نہ تھا

शायर: Faheem Gorakhpuri13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्यों कहूँ मैं कि सितम का मैं सज़ा-वार न था
दिल दिया था तुझे किस तरह गुनहगार न था

उम्र भर मुझ से थी हर एक को बे-वज्ह ख़लिश
क्यूँकि मैं गुलशन-ए-आलम में कोई ख़ार न था

क्या न कुछ हो गया इक ग़ैरत-ए-यूसुफ़ के लिए
कब मोहब्बत में मैं रुस्वा सर-ए-बाज़ार न था

क्या ये करता मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर-ओ-दिल का इलाज
चर्ख़-ए-बे-रहम कोई मरहम-ए-ज़ंगार न था

फ़र्द निकला फ़न-ए-दुज़दी में ख़याल-ए-दिलबर
उस का आना था कि पहलू में दिल-ए-ज़ार न था

क्या बहलता गुल-ओ-सुम्बुल से चमन में मिरा दिल
वो तिरी ज़ुल्फ़ न था ये तिरा रुख़्सार न था

अपनी क़िस्मत ही का शाकी मैं मोहब्बत में रहा
शिकवा-ए-चर्ख़ न था कुछ गिला-ए-यार न था

हश्र के रोज़ मिरे हुस्न-ए-गुनह का यारब
तेरी रहमत के सिवा कोई ख़रीदार न था

तेरी आँखों की मोहब्बत का फ़क़त था उसे रोग
वर्ना कुछ नर्गिस-ए-बीमार को आज़ार न था

तुम ने महफ़िल में जगह दी उसे हसरत है मुझे
ग़ैर इस आव-भगत का तो सज़ा-वार न था

नर्गिस उस आँख की बीमार-ए-गुल उस रुख़ पे निसार
बाग़-ए-आलम में किसे इश्क़ का आज़ार न था

हो गई रस्म-ए-मुलाक़ात चलो बहस है क्या
तुम ख़ता पर न थे और मैं भी वफ़ादार न था

दो प्यालों में है साक़ी के अजब कैफ़ 'फहीम'
आँखें मिलते ही वो था कौन जो सरशार न था