उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kufr mein bhi hum rahe qismat se iman ki taraf

कुफ़्र में भी हम रहे क़िस्मत से ईमाँ की तरफ़

کفر میں بھی ہم رہے قسمت سے ایماں کی طرف

शायर: Zaheer Dehlvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुफ़्र में भी हम रहे क़िस्मत से ईमाँ की तरफ़
शुक्र है काबा भी निकला कू-ए-जानाँ की तरफ़

कुछ असीरान-ए-क़फ़स के बख़्त ही बरगश्ता हैं
बू-ए-गुल फिर फिर गई उल्टी गुलिस्ताँ की तरफ़

देखते मर कर किसी पर लुत्फ़-ए-उम्र-ए-जाविदाँ
क्यूँ गए ख़िज़्र ओ सिकंदर आब-ए-हैवाँ की तरफ़

देखिए क्या गुल खिलाए फ़स्ल-ए-गुल आती तो है
हाथ अभी से दौड़ते हैं जैब ओ दामाँ की तरफ़

रश्क कहता है कि पोंछे होंगे उस से अश्क-ए-ग़ैर
हाथ उठ कर रह गया सौ बार दामाँ की तरफ़