उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh sazaen aur bhi hain taziyanon se pare

कुछ सज़ाएँ और भी हैं ताज़ियानों से परे

کچھ سزائیں اور بھی ہیں تازیانوں سے پرے

शायर: Yasir Raza Asif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ सज़ाएँ और भी हैं ताज़ियानों से परे
इक असीरी और भी है क़ैद-ख़ानों से परे

ख़ून जिन का दौड़ता है सब मशीनों में यहाँ
वो सिसकते लोग हैं इन कार-ख़ानों से परे

जिस के दम से थीं हमारे शहर की सब रौनक़ें
वो भी जा के बस गया है दो जहानों से परे

वालिहाना रक़्स करती जा रही थी साथ साथ
डूबते सूरज की लाली सारबानों से परे

कुछ तो लहरों से हमारी चल रही थी दुश्मनी
कुछ हवा भी साज़िशी थी बादबानों से परे

इक ख़ला ने मुस्तक़िल मुझ में ठिकाना कर लिया
इक ख़ला फैला हुआ है आसमानों से परे

मुझ से वो मिलता है 'आसिफ़' आदमी के भेस में
उस का मुझ से राब्ता है आस्तानों से परे