उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh aur mere dard ke sholon ko hawa do

कुछ और मिरे दर्द के शो'लों को हवा दो

کچھ اور مرے درد کے شعلوں کو ہوا دو

शायर: Jaleel 'Aali'7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ और मिरे दर्द के शो'लों को हवा दो
बे-नूर हुए दाग़ अँधेरा है ज़िया दो

पीछे ग़म-ओ-अंदोह के फ़िरऔन का लश्कर
आगे अलम-ओ-यास का दरिया है असा दो

मैं दश्त-ए-ग़म-ए-इश्क़ में हँसता हुआ आऊँ
रस्ते से ग़म-ए-दहर की दीवार हटा दो

मैं और सुलगता हुआ सहरा-ए-तजस्सुस
भटका हुआ राही हूँ कोई राह दिखा दो

क्यूँ मेरी शिकस्तों को सहारा नहीं मिलता
इंसान हूँ मुहताज ख़ुदा का हूँ ख़ुदा दो

इस शहर में जीने की है अब एक ही सूरत
एहसास के मंसूर को सूली पे चढ़ा दो

इस दौर का सुक़रात हूँ सच बोल रहा हूँ
क्या देर है क्यूँ चुप हो मुझे ज़हर पिला दो