उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi riste hue zaKHmon ki dawa ban jae

कोई रिसते हुए ज़ख़्मों की दवा बन जाए

کوئی رستے ہوئے زخموں کی دوا بن جائے

शायर: Rafiq Siraji7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई रिसते हुए ज़ख़्मों की दवा बन जाए
कोई बीमार-ए-मोहब्बत का ख़ुदा बन जाए

कोई बे-सूद उमीदों का सहारा होवे
कोई बहते हुए अश्कों की रिदा बन जाए

कोई पहुँचे मिरी तस्कीन का सामाँ बन कर
कोई तड़पी हुई आहों की सदा बन जाए

कोई हमदर्द उठे मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार बने
मेरे हक़ में कोई फिर दस्त-ए-दुआ' बन जाए

कोई उभरे मिरे होंटों पे सियाही बन कर
आख़री हिचकी बने वज्ह-ए-क़ज़ा बन जाए

कोई दरमाँदा जवानी को भी पहनाए कफ़न
रोए चिल्लाए कि पुर-शोर फ़ज़ा बन जाए

हम को ले जाए मज़ारों के नगर कोई 'रफ़ीक़'
कोई बे-दस्त जनाज़े का असा बन जाए