उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek be-karan sukut hai ab shamil-e-hayat

इक बे-कराँ सुकूत है अब शामिल-ए-हयात

اک بے کراں سکوت ہے اب شامل حیات

शायर: Rafiq Siraji5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक बे-कराँ सुकूत है अब शामिल-ए-हयात
उफ़ किस जगह पे ठहर गई नब्ज़-ए-काएनात

दुख है न मस्तियाँ हैं न आवारगी कोई
अल्लाह-रे क़यामत-ए-पज़मुर्दगी-ए-ज़ात

नश्शा था ज़िंदगी थी तबीअ'त जवान थी
अब ग़म नहीं जो तेरा तो बे-रंग है हयात

मेरे जुनूँ को आप सुख़न-गुस्तरी कहें
पिन्हाँ हैं एक लफ़्ज़ में कितने ही तजरबात

आओ 'रफ़ीक़' ढूँढें कोई हम-ख़याल फिर
नय दिन में चैन है न सुकूँ हम को रात रात