उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi manzil nahin milti to Thahar jate hain

कोई मंज़िल नहीं मिलती तो ठहर जाते हैं

کوئی منزل نہیں ملتی تو ٹھہر جاتے ہیں

शायर: Kafeel Aazar Amrohvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई मंज़िल नहीं मिलती तो ठहर जाते हैं
अश्क आँखों में मुसाफ़िर की तरह आते हैं

क्यूँ तिरे हिज्र के मंज़र पे सितम ढाते हैं
ज़ख़्म भी देते हैं और ख़्वाब भी दिखलाते हैं

हम भी इन बच्चों की मानिंद कोई पल जी लें
एक सिक्का जो हथेली पे सजा लाते हैं

ये तो हर रोज़ का मामूल है हैरान हो क्यूँ
प्यास ही पीते हैं हम भूक ही हम खाते हैं

हर बड़ा बच्चों को जीने की दुआ देता है
हम भी शायद इसी विर्से की सज़ा पाते हैं

सुब्ह ले जाते हैं हम अपना जनाज़ा घर से
शाम को फिर इसे काँधों पे उठा लाते हैं

शहर की भीड़ में क्या हो इसी ख़ातिर 'आज़र'
अपनी पहचान को हम घर में ही छोड़ आते हैं