उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dekh lo KHwab magar KHwab ka charcha na karo

देख लो ख़्वाब मगर ख़्वाब का चर्चा न करो

دیکھ لو خواب مگر خواب کا چرچا نہ کرو

शायर: Kafeel Aazar Amrohvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

देख लो ख़्वाब मगर ख़्वाब का चर्चा न करो
लोग जल जाएँगे सूरज की तमन्ना न करो

किर्चियाँ टूटे हुए 'अक्स की चुभ जाएँगी
और कुछ रोज़ अभी आइना देखा न करो

अजनबी लगने लगे ख़ुद तुम्हें अपना ही वुजूद
अपने दिन रात को इतना भी अकेला न करो

ख़्वाब बच्चों के खिलौनों की तरह होते हैं
ख़्वाब देखा न करो ख़्वाब दिखाया न करो

बे-ख़याली में कभी उँगलियाँ जल जाएँगी
राख गुज़रे हुए लम्हों की कुरेदा न करो

मोम के रिश्ते हैं गर्मी से पिघल जाएँगे
धूप के शहर में 'आज़र' ये तमाशा न करो