उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi manzil bhi nahin hai koi rasta bhi nahin

कोई मंज़िल भी नहीं है कोई रस्ता भी नहीं

کوئی منزل بھی نہیں ہے کوئی رستہ بھی نہیں

शायर: Balbir Rathi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई मंज़िल भी नहीं है कोई रस्ता भी नहीं
और सब महव-ए-सफ़र हैं कोई रुकता भी नहीं

हर तरफ़ बे-रंग सी गहरी उदासी का जमाव
एक रंगीं ख़्वाब जो नज़रों से हटता भी नहीं

इक मुसलसल सी ये सई-ए-राइगाँ ये काविशें
एक पत्थर सा ये मंज़र जो पिघलता भी नहीं

बे-सबब सी टीस दिल में मुस्तक़िल होती हुई
जज़्बा-ए-बेबाक जो दिल में उतरता भी नहीं

हर तरफ़ ये धूप हर-दम तेज़-तर होती हुई
मोम का इक शहर लेकिन जो पिघलता भी नहीं