उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi baadal tapish-e-gham se pighalta hi nahin

कोई बादल तपिश-ए-ग़म से पिघलता ही नहीं

کوئی بادل تپش غم سے پگھلتا ہی نہیں

शायर: Yaqoob Rahi3 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई बादल तपिश-ए-ग़म से पिघलता ही नहीं
और दिल है कि किसी तरह बहलता ही नहीं

सब यहाँ बैठे हैं ठिठुरे हुए जम्मू को लिए
धूप की खोज में अब कोई निकलता ही नहीं

सिर्फ़ इक मैं हूँ जो हर रोज़ नया लगता हूँ
वर्ना इस शहर में तो कोई बदलता ही नहीं