उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kohkan-e-shab the raha shaghl sahar hone tak

कोहकन-ए-शब थे रहा शग़्ल सहर होने तक

کوہ کن شب تھے رہا شغل سحر ہونے تک

शायर: R P Shokh7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोहकन-ए-शब थे रहा शग़्ल सहर होने तक
सर पटकना इसी दीवार में दर होने तक

उस की आदत थी मिरे ख़ून को पानी करना
रंग क्या क्या न उड़ा आँख के तर होने तक

अब दवा है न दुआ है न मसीहा गोया
हर ख़ुदाई थी मिरा ख़ून-ए-जिगर होने तक

उम्र भर फिर से जुदाई को मोहब्बत कहना
देखना भी है ज़माने की नज़र होने तक

अपनी आहें ही सुबुक-गाम न होने देंगी
पा-ब-ज़ंजीर चलो ख़त्म-ए-सफ़र होने तक

शहर का शहर हुआ अब तो तआ'क़ुब में मिरे
तेरा जादू भी था मुझ ख़ाक-बसर होने तक

ये तो मैं था कि तराशा है हर इक ज़ख़्म से फूल
हाथ कट जाते हैं नाख़ुन में हुनर होने तक