उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi maqam se guzre nahin phisalta hai

किसी मक़ाम से गुज़रे नहीं फिसलता है

کسی مقام سے گزرے نہیں پھسلتا ہے

शायर: Aalam Nizami7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी मक़ाम से गुज़रे नहीं फिसलता है
जो हक़-परस्तों के नक़्श-ए-क़दम पे चलता है

सुना है करने लगा है वो रौशनी तक़्सीम
मिरे चराग़ से जिस का चराग़ जलता है

फ़ज़ा-ए-ज़ीस्त पे छाई हुई है तारीकी
बहुत दिनों से ये मंज़र नहीं बदलता है

बिसात इतनी कहाँ है जो छेड़ें सूरज को
इन आँधियों का दियों पर ही ज़ोर चलता है

तुम्हारे ज़ुल्म पे चुप हूँ ये ज़र्फ़ है मेरा
उबलने को तो मिरा भी लहू उबलता है

हमें न कीजिए मजबूर हिजरतों के लिए
दरख़्त अपना ठिकाना नहीं बदलता है

ख़ुदा ही हामी-ओ-नासिर है उस का ऐ 'आलम'
जो खा के बारहा ठोकर नहीं सँभलता है