उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi ke zehn mein kya hai nazar nahin aata

किसी के ज़ेहन में क्या है नज़र नहीं आता

کسی کے ذہن میں کیا ہے نظر نہیں آتا

शायर: Aalam Nizami5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी के ज़ेहन में क्या है नज़र नहीं आता
मिज़ाज पढ़ने का सब को हुनर नहीं आता

हर एक शख़्स मुसाफ़िर है ऐसी मंज़िल का
जहाँ से कोई कभी लौट कर नहीं आता

हज़ारों फ़न पे यहाँ दस्तरस है लोगों को
हमें सलीक़े से कोई हुनर नहीं आता

ज़बान-ओ-दिल की तहारत का जाएज़ा ले लें
जिन्हें है शिकवा दु'आ में असर नहीं आता

जिसे समझते हैं आसान हम बहुत 'आलम'
हमें समझ में वही 'उम्र-भर नहीं आता