उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi bhi KHwab mein jab dilkashi baqi nahin rahti

किसी भी ख़्वाब में जब दिलकशी बाक़ी नहीं रहती

کسی بھی خواب میں جب دل کشی باقی نہیں رہتی

शायर: Balbir Rathi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी भी ख़्वाब में जब दिलकशी बाक़ी नहीं रहती
तो फिर जज़्बात में वो बात ही बाक़ी नहीं रहती

गुज़र तो हो ही जाती है सँभल कर चलने वालों की
मगर फिर ज़िंदगी में ज़िंदगी बाक़ी नहीं रहती

तुम्हें अच्छी नहीं लगतीं मिरी बे-बाकियाँ लेकिन
तकल्लुफ़ में भी अक्सर दोस्ती बाक़ी नहीं रहती

जवानी में भला कैसे करें हम होश की बातें
कि ऐसी बे-ख़ुदी में आगही बाक़ी नहीं रहती

हटाओ साग़र-ओ-मीना नहीं मय की तलब मुझ को
हसीं आँखों से पी कर तिश्नगी बाक़ी नहीं रहती