उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kis waqt bujhi sham-e-tamanna mere aage

किस वक़्त बुझी शम'-ए-तमन्ना मिरे आगे

کس وقت بجھی شمع تمنا مرے آگے

शायर: Jaleel Hashmi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किस वक़्त बुझी शम'-ए-तमन्ना मिरे आगे
सूरज मिरे पीछे है तो साया मिरे आगे

देखा तो शनासा नज़र आया नहीं इंसाँ
सोचा तो दिल-ए-संग भी धड़का मिरे आगे

इस बज़्म को ख़ल्वत-गह-ए-अम्बोह ही कहिए
इस बज़्म में हर शख़्स है तन्हा मिरे आगे

शायद कि यहीं पर है मिरे नाम की सूली
आता है बहुत दिन से मसीहा मिरे आगे

मैं सोच रहा था कि ये रुत कौन सी होगी
ना-गाह गिरा टूट के पत्ता मिरे आगे

मसरूफ़-ए-सुख़न रहता हूँ मैं किस से शब-ओ-रोज़
रहता है बराबर कोई चेहरा मिरे आगे

ख़ुद बीच में हाएल है मिरी ज़ात ही प्यारे
देखूँ तुझे क्यूँकर कि है पर्दा मिरे आगे

'हशमी' शजर-ए-शब के ये फैले हुए साए
और वो है कि इक धूप का टुकड़ा मिरे आगे