उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kis kis ko aaj roiye kya kya gaya nahin

किस किस को आज रोइए क्या क्या गया नहीं

کس کس کو آج روئیے کیا کیا گیا نہیں

शायर: Jagdish Mehta Dard11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किस किस को आज रोइए क्या क्या गया नहीं
कहते हैं लोग घर कोई लूटा गया नहीं

कहते हैं जिस को हासिल-ए-बहबूदी-ए-हयात
ऐसा कोई सवाल उठाया गया नहीं

मेरा भी ज़िक्र-ए-ख़ैर हो हर बज़्म-ए-नाज़ में
ऐसा मिरे नसीब में लिक्खा गया नहीं

वो भी मिरा चलन था कि शीराज़ा-ए-हयात
बिखरा कुछ इस तरह कि समेटा गया नहीं

अब भी खनक नहीं है नवेद-ए-बहार में
सेहन-ए-चमन से ख़ौफ़ ख़िज़ाँ का गया नहीं

अब क्या करें ख़ुलूस-ओ-मुरव्वत के तज़्किरे
हिर्स-ओ-हवस से दूर ज़माना गया नहीं

हर इक क़दम पे साया-ए-आ'माल साथ था
कोई 'अदम के शहर में तन्हा गया नहीं

मैं ख़ुद-बख़ुद बना हूँ तमाशाइयों से पूछ
कोई मुझे बना के तमाशा गया नहीं

अब आप क्या करेंगे मदावा-ए-सोज़-ए-ग़म
मंज़र तो ग़म का आप से देखा गया नहीं

जज़्बा-ए-सब्र-ओ-शुक्र मेरे काम आ गया
क्या था जो मेरे बख़्त में लिक्खा गया नहीं

सच तो ये है नसीब मुआफ़िक़ नहीं मिरा
ऐ 'दर्द' दे के वो मुझे धोका गया नहीं