उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gham ko uTha ke dur KHalaon mein Dal do

ग़म को उठा के दूर ख़लाओं में डाल दो

غم کو اٹھا کے دور خلاؤں میں ڈال دو

शायर: Jagdish Mehta Dard11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़म को उठा के दूर ख़लाओं में डाल दो
'उम्र-ए-रवाँ को शीशा-ओ-साग़र में डाल दो

कैफ़-ए-तमाम दो कि ग़म-ए-ला-ज़वाल दो
अरमान कोई तो मिरे दिल का निकाल दो

साया मिरे वुजूद पे ज़ुल्फ़ों का डाल दो
वर्ना सलाह-ए-चारा-ए-रंज-ओ-मलाल दो

अहल-ए-ख़िरद तमाशा-ए-बुग़ज़-ओ-'इनाद हैं
अहल-ए-ख़िरद को हद्द-ए-जुनूँ से निकाल दो

ऐसा न हो कि फिर कोई उजड़े मिरी तरह
अहल-ए-तलब को शौक़ से मेरी मिसाल दो

शामिल मिरा लहू भी है हुस्न-ए-जमाल में
इक दिन मुझे भी दा'वत-ए-जश्न-ए-जमाल दो

इक जुंबिश-ए-निगाह-ए-मोहब्बत-नवाज़ से
काँटे मिरे वुजूद से ग़म के निकाल दो

करना है वा अभी तो मुझे 'उक़्दा-ए-हयात
थोड़ी सी और भी मिरे साग़र में डाल दो

बेहतर नहीं हुज़ूर त'अल्लुक़ ख़राब हों
अच्छा है बद-गुमानियाँ दिल से निकाल दो

ऐसी ख़ुशी भी क्या जिसे हासिल नहीं सबात
ग़म मुस्तक़िल जो हों मिरे दामन में डाल दो

ये हुस्न ये शबाब कोई देर-पा नहीं
हसरत कोई तो 'दर्द' के दिल की निकाल दो