उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chaar din ki zindagi dozaKH bhi hai jannat bhi hai

चार दिन की ज़िंदगी दोज़ख़ भी है जन्नत भी है

چار دن کی زندگی دوزخ بھی ہے جنت بھی ہے

शायर: Jagdish Mehta Dard7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

चार दिन की ज़िंदगी दोज़ख़ भी है जन्नत भी है
दर्द भी है ग़म भी है राहत भी है 'इशरत भी है

ज़ख़्म खा कर भूलना आसाँ नहीं होता मगर
ज़ख़्म खा कर भूल जाने की हमें 'आदत भी है

गाहे-गाहे ज़िंदगी की सर्द रातों के लिए
मय की ख़्वाहिश भी सुलगते जिस्म की हाजत भी है

आप ने इस सिलसिले में ग़ौर फ़रमाया नहीं
मेरी रुस्वाई से पैदा आप की शोहरत भी है

कल ख़ुदा मा'लूम क्या अंदाज़ हो हालात का
आज तन्हाई भी है मौसम भी है फ़ुर्सत भी है

दिल लगा कर जान भी देना मिरी ख़सलत रही
दिल लगा कर भूल जाना आप की फ़ितरत भी है

'दर्द' साहब आप किस ग़म से परेशाँ हो गए
ज़िंदगी में ग़म भी है हसरत भी है आफ़त भी है