उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwahishon ki baadshahi kuchh nahin

ख़्वाहिशों की बादशाही कुछ नहीं

خواہشوں کی بادشاہی کچھ نہیں

शायर: Tahir Azeem6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाहिशों की बादशाही कुछ नहीं
दिल में शौक़-ए-कज-कुलाही कुछ नहीं

क्यूँ अदालत को शवाहिद चाहिएँ
क्या ये ज़ख़्मों की गवाही कुछ नहीं

सुब्ह लिक्खी है अगर तक़दीर में
रात की फिर ये सियाही कुछ नहीं

सोच अपनी ज़ात तक महदूद है
ज़ेहन की क्या ये तबाही कुछ नहीं

ज़र्फ़ शामिल है हमारे ख़ून में
ये तुम्हारी कम-निगाही कुछ नहीं

हँस के मिलता है उमूमन वो 'अज़ीम'
इस तरह जैसे हुआ ही कुछ नहीं