उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwab jo bhi buna wo buna rah gaya

ख़्वाब जो भी बुना वो बुना रह गया

خواب جو بھی بنا وہ بنا رہ گیا

शायर: Gautam Rajrishi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाब जो भी बुना वो बुना रह गया
उम्र बीती मगर बचपना रह गया

अक्स जितने थे सारे बदलते रहे
आइना तो वही आइना रह गया

देख कर बादलों का उमड़ता हुजूम
लब पे सूरज के कुछ गुनगुना रह गया

तू मिला तो मुझे ये अचानक लगा
कैसे अब तक मैं तेरे बिना रह गया

हाशिए पर पड़े हम भला क्या कहें
जब भी जो भी कहा अन-सुना रह गया