उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwab aankhon mein nihan hai ab bhi

ख़्वाब आँखों में निहाँ है अब भी

خواب آنکھوں میں نہاں ہے اب بھی

शायर: Ehtisham Akhtar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाब आँखों में निहाँ है अब भी
बुझ गई आग धुआँ है अब भी

वो मिरे पास नहीं है लेकिन
उस के होने का गुमाँ है अब भी

क्या बहादुर कोई आया ही नहीं
राह में संग-ए-गिराँ है अब भी

कोई प्यासा ही नहीं है वर्ना
चश्मा-ए-शौक़ रवाँ है अब भी

घर को काँधे पे लिए फिरता हूँ
मुझ में ये ताब-ओ-तवाँ है अब भी

मैं तअल्लुक़ से परे हूँ लेकिन
मुझ से वाबस्ता जहाँ है अब भी