उर्दू शायरी · ग़ज़ल

khuli lashon ka qabristan ban ke

खुली लाशों का क़ब्रिस्तान बन के

کھلی لاشوں کا قبرستان بن کے

शायर: Madhuvan Rishi Raj4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

खुली लाशों का क़ब्रिस्तान बन के
बहुत चुप है ज़मीं वीरान बन के

शरीक़-ए-मजलिस-ए-दरवेश हो कर
तिरे दर जाएँगे मेहमान बन के

है ये ख़ूँ की नदी तख़्लीक़ तेरी
कहाँ तू चल दिया अंजान बन के

यहाँ पर आग है मेरी लगाई
कि हूँ शर्मिंदा मैं इंसान बन के