उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHuddariyon ki had se nikalna paDa mujhe

ख़ुद्दारियों की हद से निकलना पड़ा मुझे

خودداریوں کی حد سے نکلنا پڑا مجھے

शायर: Aalam Nizami7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद्दारियों की हद से निकलना पड़ा मुझे
माहौल की चिताओं में जलना पड़ा मुझे

वो मस्लहत थी क्या थी मुझे कुछ नहीं पता
अपना हर इक उसूल बदलना पड़ा मुझे

सोचा था मैं रहूँगा हमेशा 'उरूज पर
सूरज की तरह शाम को ढलना पड़ा मुझे

माँ के हसीन चाँद से चेहरे को देख कर
बचपन की याद आई मचलना पड़ा मुझे

बुझता जो मैं तो मिटता निशाँ ख़ानदान का
मैं आख़िरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे

पाना कठिन है ज़ेवर-ए-किरदार दोस्तो
चाँदी की तरह आग में गलना पड़ा मुझे

यूँही कहाँ मिले हैं ये दो-चार फूल भी
'आलम' हज़ार काँटों पे चलना पड़ा मुझे