उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud-saKHta baaten thin sahifa kise kahte

ख़ुद-साख़्ता बातें थीं सहीफ़ा किसे कहते

خود ساختہ باتیں تھیں صحیفہ کسے کہتے

शायर: Faizi Ababeel6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद-साख़्ता बातें थीं सहीफ़ा किसे कहते
हम शहर-ए-'अदावत में मसीहा किसे कहते

जिस जिस को भी देखा वही मसरूफ़-ए-'अमल था
हम बज़्म में इस दिल का फ़साना किसे कहते

जब साहब-ए-साहिल ने ही साहिल को न माना
फिर डूबने वाले भी किनारा किसे कहते

वो तेरी गली हो या रक़ीबों की नज़र हो
हम अपने सिवा और तमाशा किसे कहते

नूर आँख का खोया न जवानी ही गँवाई
दो दिन के दिवानों में ज़ुलेख़ा किसे कहते

सर सज्दे में रखना ही ज़रूरी था तो फिर हम
इस अर्ज़ पे मस्जिद या कलीसा किसे कहते