उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud ko paDhta hun chhoD deta hun

ख़ुद को पढ़ता हूँ छोड़ देता हूँ

خود کو پڑھتا ہوں چھوڑ دیتا ہوں

शायर: Tahir Faraz7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद को पढ़ता हूँ छोड़ देता हूँ
इक वरक़ रोज़ मोड़ देता हूँ

इस क़दर ज़ख़्म हैं निगाहों में
रोज़ इक आईना तोड़ देता हूँ

मैं पुजारी बरसते फूलों का
छू के शाख़ों को छोड़ देता हूँ

तुझ से रिश्ता है रेशमी रिश्ता
कच्चे धागे मैं तोड़ देता हूँ

कासा-ए-शब में ख़ून सूरज का
क़तरा क़तरा निचोड़ देता हूँ

काँपते होंट भीगती पलकें
बात अधूरी ही छोड़ देता हूँ

रेत के घर बना बना के 'फ़राज़'
जाने क्यों ख़ुद ही तोड़ देता हूँ