उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud ko nashtar aap chubhona paDta hai

ख़ुद को नश्तर आप चुभोना पड़ता है

خود کو نشتر آپ چبھونا پڑتا ہے

शायर: Faisal Tufail6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद को नश्तर आप चुभोना पड़ता है
दिल की ख़ातिर आँख को रोना पड़ता है

डरता हूँ कि कहीं ख़यानत ही न हो
कभी कभी जब अपना होना पड़ता है

मौत से कम पर ताली नहीं बजाते लोग
मंज़र में कुछ दर्द समोना पड़ता है

जानता हूँ कि बंजर है ये ख़्वाब मिरा
फिर भी इस के साथ ही सोना पड़ता है

हर प्यासे की प्यास बुझानी पड़ती है
दरिया को तो दरिया होना पड़ता है

देख रहा हूँ खौलता तेल है बर्तन में
फिर भी इस में हाथ डुबोना पड़ता है