उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud ko is shahr mein tanha bhi nahin kah sakte

ख़ुद को इस शहर में तन्हा भी नहीं कह सकते

خود کو اس شہر میں تنہا بھی نہیں کہہ سکتے

शायर: Nafas Ambalvi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद को इस शहर में तन्हा भी नहीं कह सकते
और किसी शख़्स को अपना भी नहीं कह सकते

अपनी क़ुर्बत में भी तू ने हमें प्यासा रक्खा
हम तो दरिया तुझे दरिया भी नहीं कह सकते

किस के सज्दों में झुकें किस से दु'आएँ माँगें
हर किसी को तो मसीहा भी नहीं कह सकते

गाँव में आज भी लगता है वो घर है अपना
उस की मिट्टी को तो मलबा भी नहीं कह सकते

ज़िंदगी एक तमाशा है मगर क्या कीजे
इस तमाशे को तमाशा भी नहीं कह सकते

रोज़ आईने में मिलता है नए ज़ख़्म लिए
एक चेहरा जिसे चेहरा भी नहीं कह सकते