उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHizan mausam mein bhi dil ko agar shadab rakhna tha

ख़िज़ाँ मौसम में भी दिल को अगर शादाब रखना था

خزاں موسم میں بھی دل کو اگر شاداب رکھنا تھا

शायर: Obaidur Rahman7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़िज़ाँ मौसम में भी दिल को अगर शादाब रखना था
तो फिर वीरान आँखों में सुनहरे ख़्वाब रखना था

अँधेरी रात का मुश्किल सफ़र आसान हो जाता
नज़र में जल्वा-ए-ख़ुर्शीद-ए-‘आलम-ताब रखना था

जो कुछ पाना नहीं था सिर्फ़ खोना था मुक़द्दर में
'अबस नादान दिल को इस क़दर बेताब रखना था

ब-नाम-ए-फ़स्ल-ए-मुस्तक़बिल छिड़कना था लहू दिल का
ज़मीं बंजर सही फिर भी इसे शादाब रखना था

बला से टूट जाता अपने दिल का शीशा-ए-नाज़ुक
मगर हम को ख़याल-ए-ख़ातिर-ए-अहबाब रखना था

उजाले का तसव्वुर भी उजाले की बशारत है
अंधेरे घर में कोई किर्मक-ए-शब-ताब रखना था

इरादों की बुलंदी ने सहारा दे दिया दिल को
'उबैद' अपना क़दम हम को सर-ए-महताब रखना था