उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHamosh peD ke sae mein sham karte hain

ख़मोश पेड़ के साए में शाम करते हैं

خموش پیڑ کے سائے میں شام کرتے ہیں

शायर: Vikram Sharma8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़मोश पेड़ के साए में शाम करते हैं
चलो परिंदों की नींदें हराम करते हैं

ये लोग कोई तवक़्क़ो' लगा के बैठे थे
मैं सोचता था मिरा एहतिराम करते हैं

हर एक बात पे उस का नसीहतें करना
कभी ये फूल भी पत्थर का काम करते हैं

कुछ एक लोग हैं दफ़्तर में दश्त में हैं कुछ
हम अपने घर में हैं और दोनों काम करते हैं

ज़रा ठहर के बिछड़ने का फ़ैसला करना
सफ़र से पहले भी थोड़ा क़ियाम करते हैं

हमारा मूड तो दिन में उदास होता है
मगर जो रात में हम ताम-झाम करते हैं

जो दिल हुआ तो कभी दास्ताँ सुनाएँगे
अभी तो तज़्किरे पे इख़्तिताम करते हैं

हर एक लम्हा 'इबादत शुमार होता है
कभी ख़ुदा कभी ख़ुद से कलाम करते हैं