उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHamdar aur gesu-e-KHamdar ho gaya

ख़मदार और गेसू-ए-ख़मदार हो गया

خم دار اور گیسوئے خم دار ہو گیا

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़मदार और गेसू-ए-ख़मदार हो गया
अबरू-ए-यार का ये तरफ़-दार हो गया

बे-इश्क़ यक मरज़ थी मुझे अपनी ज़िंदगी
अच्छा हुआ जो इश्क़ का आज़ार हो गया

दिल उस के इश्क़ से कभी हिम्मत न हारता
तेग़-ए-फ़िराक़ से जिगर अफ़गार हो गया

ईमान और कुफ़्र के झगड़ों ने ये किया
इक दिल दो आफ़तों में गिरफ़्तार हो गया

वा'दे की रात आ के वो क्या सोए मेरे घर
ख़्वाबीदा बख़्त था मिरा बेदार हो गया

क्यूँकर न खाएँ ख़ार अदू इस बहार से
वो रश्क-ए-गुल गले का मिरे हार हो गया

बैठे-बिठाए घर में ये दौलत हुई नसीब
उस माह-वश का ख़्वाब में दीदार हो गया

बाज़ार-ए-इश्क़ में यही सौदा गया है आज
ईमान दे के उस का ख़रीदार हो गया

क्या उस को समझे हो वो पुराना है बादा-कश
कब पारसा था 'शाद' जो मय-ख़्वार हो गया