उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHana-e-dil kaba hai ye koi but-KHana nahin

ख़ाना-ए-दिल काबा है ये कोई बुत-ख़ाना नहीं

خانۂ دل کعبہ ہے یہ کوئی بت خانہ نہیں

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ाना-ए-दिल काबा है ये कोई बुत-ख़ाना नहीं
बे-धड़क आ जाओ इस में कोई बेगाना नहीं

नग़्मा-ए-तौहीद हम से सुन के वाइज़ राग का
अपनी बीती है ये कुछ ग़ैरों का अफ़्साना नहीं

है ये काशाना किसी का अपना ये ख़ाकी वजूद
ऐ बरहमन ये बुतों का कोई बुत-ख़ाना नहीं

आँख से उस ने मिलाई आँख कैफ़िय्यत हुई
ये नशीली आँख है पुर मय से पैमाना नहीं

ज़िक्र से रिंदों के वाइज़ तू अभी वाक़िफ़ नहीं
ये तो हू-हक़ की सदा है शोर-ए-रिंदाना नहीं

आप ही के दम-क़दम से घर मिरा आबाद है
ख़ाना-ए-दिल आप का है कोई वीराना नहीं

ऐन-मस्ती में भी रहता है उसे पास-ए-अदब
हाँ बड़ा हुशियार है कुछ 'शाद' दीवाना नहीं